
” दहेज नहीं बेटी चाहिए अब “

बड़ा अजीब सा शिक्षित समाज है ना ?
आप खुद देखो ना इतना शिक्षित होने के बाद भी
आजकल विवाह का क्या मतलब रह गया है ??
दो लोगों का आपस में हमेशा के लिए साथ रहना
बिल्कुल नहीं …
आप खुद देखो ना
आज विवाह से पहले लिस्ट दी जाती है
लिस्ट ?
बिल्कुल हाँ दहेज की लिस्ट तो कहीं गहनों की लिस्ट
बाकी और भी
आज के दौर में लड़की के घर वाले इकट्ठा करते हैं जिंदगी भर की कमाई
और हिसाब लगाते हैं कहीं कुछ छूट तो नहीं रहा है लड़की के लिए
वहीं लड़के का परिवार तोलता है उस सोने को और हिसाब लगाता है कितनी इज्जत मिली और क्या-क्या नहीं मिला
मैं पूछता हूँ इस शिक्षित समाज से
क्या ये सही है
बिल्कुल नहीं
क्या बिना भारी हार के बिना सोने के झुमको के बोझ के
बिना भारी चूड़ियों की खनक के
बिना भारी सामान के साथ
वो लड़की सुन्दर नहीं लगती है ?
या जरूरी है ये सब लेना उसके साथ भी
कभी बिना इन सब के उस लड़की को देखो
उस पिता की मेहनत उस माँ को देखो
उन भाई बहिन के प्यार को देखो
बिना इन सब के
उस लड़की के मन में कितना सुकून है
वो पिता कितना खुश है
वो परिवार कितना खुश है
आँखों में बिलकुल डर नहीं है
है तो सिर्फ भरोसा !
पर वास्तविकता तो ये है ना..
डिग्री दीवार पर लटकी है,
और सोच वहीं 20 साल पुरानी है
वैसे M.Com कर लिया है लड़की ने,
अब तैयारी करती है
फिर भी विवाह में पूछते हैं
और वो लिस्ट वाला सामान भी दे रहे हो क्या?
स्कूल में कहते हैं आज भी “लड़कियां लड़कों से कम नहीं हैं
और रिश्ते में आते ही पूछते हैं
लड़की घर का काम तो कर लेगी ना ?
लड़की के पिता क्या करते हैं ?
वैसे कितनी जमीन है आपकी ?
और अधिकतर कहते हैं आगे इसे
पढ़ाएंगे नहीं हम
मैं पूछता हूँ क्या उस लड़की के सपने नहीं हैं ?
या उसे हक नहीं आगे पढ़ने का ?
कहते है ये घर में हमारे साथ रहेगी
घर के काम करेगी
और पूछते हैं
वैसे ये बताओ गाड़ी कौन सी दोगे आप ?
एक तरफ कहते हैं हम दहेज नहीं लेते
दूसरी तरफ शगुन के नाम पर कार की चाबी मांग लेते हैं
एक तरफ कहते हैं हमें कुछ नहीं चाहिए
तो दूसरी तरफ शादी के बाद जिंदगी भर ताने देते हैं
फलाने के परिवार ने तो इतना दिया था
तेरे यहां से कुछ नहीं आया
देखा जाए तो लड़की के पिता की पूरी कमाई एक दिन में उड़ जाती है,
लड़की के माँ का साथ छूट जाता है
भाई बहिन का वो प्यार छूट जाता है
और फिर भी उन्हें सुनना पड़ता है आप लोगों ने तो कुछ किया ही नहीं है
ना ही कुछ दिया है
अब आप ही बताओ इतना शिक्षित होने के बाद भी
क्या ये इज्जत का हिसाब तोला जाता है किलो में?
क्या प्यार की कीमत लगती है लाखों में?
बिल्कुल नहीं
अगर पढ़ा-लिखा कर भी लड़की को बोझ ही समझना था
तो इतना काबिल ही क्यों बनाया था?
अगर रिश्ता दिल से नहीं, लिस्ट से जोड़ना था
तो फिर शादी क्यों की थी?
पर सच तो यही है
मैं समझता हूँ जब तक ये लिस्ट चलती रहेगी, तब तक रिश्ते बिलकुल नहीं बनेंगे
जब तक सोना तोला जाएगा, तब तक इज्जत बिलकुल नहीं होगी
और जिस दिन बिना गहनों के भी
एक पिता गर्व से कहेगा “ये मेरी बेटी है”
और एक ससुराल कहेगा हमें दहेज नहीं, बेटी चाहिए
उसी दिन विवाह का असली मतलब समझ आएगा
उसी दिन विवाह सिर्फ दो लोगों की नहीं
बल्कि दो रिश्तों की होगा
वो भी बिना दहेज के
उस दिन
ना लिस्ट होगी, ना हिसाब होगा,
ना ताने होंगे, ना दिखावा होगा
होगा तो सिर्फ एक वादा
और वो वादा होगा
तेरे साथ हूँ मैं , तेरा जैसा हूँ मैं तेरे लिए हूँ मैं
उस दिन दहेज की लिस्ट जलेगी
और मैं समझता हूँ उस दिन एक नए रिश्ते की नींव बनेगी
और उस दिन वो लड़की बहु नहीं
एक बेटी बनकर आएगी
और ये समाज समझेगा वास्तव में दो रिश्तों का मिलन आज हुआ है
और ये सात जन्मों तक चलेगा !!
राकेश उप्रेती
अल्मोड़ा उत्तराखण्ड

