
” सड़कों पर भटक रहे मासूम चेहरे “

आज यात्रा के दौरान जब मैं रोडवेज पर पहुंचा तो रोडवेज पर बस से उतरते ही कुछ नन्हे मासूमों ने मुझे घेर सा लिया मेरा हाथ पकड़ लिया उम्र करीब पाँच, सात साल
शरीर पर फटे कपड़े नंगे पांव जैसे ही उन्होंने मुझे पकड़ा
मैं अचानक रुक सा गया उनके आंखों में एक उम्मीद थी !
उन्होंने कहा भैया कुछ खाना खिला दो कुछ खाया नहीं सुबह से
मैंने पूछा क्यों ?
वह बोले कुछ मिला नहीं खाने को मैंने कहा तुम्हारे मम्मी पापा वो कहां है ?
एक मासूम बोला वो तो रोडवेज की दूसरी तरफ मांग रहे हैं …
मैं कुछ क्षण चुप सा रह गया
तब मैंने पूछा कि तुम्हारी गोद में कौन है .?
वह बोला यह मेरी छोटी बहन है जिसकी उम्र करीब तीन-चार साल थी !
मैं जो खुद विद्यार्थी था
मैं कुछ क्षण के लिए उनकी मासूमियत में खो सा गया
कितने नादान कितने भोले थे वो ..
दुनिया की चालाकियां अभी उन्हें छू भी नहीं पाई थी
उनके होठों पर थोड़ी सी हँसी थी
और चेहरों पर हजारों सवाल
वो सवाल जो सिर्फ उसके नहीं है..
उसके जैसे हजार नन्हें मासूमों के है
जो फुटपाथ को बिस्तर और आसमान को छत कहते हैं !
वो फिर से बोले भैया कुछ खिला रहे हो ..
मैंने जेब से कुछ पैसे निकाले और पास की दुकान से खाना लिया जब मैं उन्हें खाना खिला रहा था तो मैं देखता रह गया उन मासूम चेहरों को
जिन्हें मानो इस खाने में सब कुछ मिल गया हो
इस खाने में पूरी दुनिया मिल गई थी उन्हें
सारा सुकून मिल गया था उन्हें
जिनकी सुबह से अभी तक की सारी थकान,भूख एक खाने की चम्मच में सिमट गई थी ..
तभी मेरे मन में एक बात चुभ गई
सपने देखने की उम्र में रोडवेज में घूम रहे हैं ये
स्कूल जाने की उम्र में सड़क नाप रहे हैं ये
आख़िर क्यों ?
ये सवाल मन में था
जिन कंधों पर स्कूल बैग होना चाहिए था
नन्हे हाथों पर कलम होनी चाहिए थी
पर क्यों किस्मत में थमा दिया उन मासूमों के हाथ में
खालीपन का ज़ख्म ?
क्या गलती थी उन मासूमों की ?
ये सवाल आज भी मुझे सोने नहीं देता
क्या उन्होंने पैदा होने से पहले ही गरीबी चुन ली थी ?
क्या उन मासूमों ने अपनी किस्मत खुद ये लिखी ?
या हम सबकी खामोशी ने उन्हें ये जिंदगी दे दी ?
क्या उन्हें हक नहीं पढ़ने का सपने देखने का ?
तूफानी बचपन जीने का खुल के हँसने का ?
क्या उन्हें हक नहीं स्कूल की घंटी सुनने का ?
नये दोस्त बनाने का होमवर्क से डरने का ?
गरीब होना जुर्म तो नहीं तो क्यों सजा मिल रही है मासूमों को ?
आज दो वक्त की रोटी पेट भरने के लिए आखिर क्यों बचपन छीन रहा है उनसे ?
और भी कई सवाल जो मन में थे मेरे ..
रोडवेज की इस सड़क पर वह अकेले नहीं थे
उन जैसी हजारों कहानियां आज हर मोड़ पर खड़ी है
बस फर्क इतना है कोई देख कर गुजर जाता है
तो कोई रुक कर उन मासूमों को खाना खिला जाता है
काश दुनिया थोड़ी सी और रहम दिल हो जाए
काश हर बच्चे को सही सा बचपन मिल जाए
काश गरीबी शब्द सिर्फ किताबों में रह जाए
काश हर बच्चा आज अपना बचपन खुल कर जिये
मैं समझता हूं
गलती उन मासूमों की नहीं है।
गलती हमारी है, इस समाज की है,
जो देखकर भी अनदेखा कर देती है।
हो सकता है मैं उनकी पूरी जिंदगी न बदल पाऊं
पर उस एक वक्त का खाना उस एक पल की इज्जत
शायद उन्हें याद रहे कि कोई तो था जिसने इंसान समझा था हमें
आज मैंने सिर्फ खाना नहीं दिया था
मैंने उन आंखों की उम्मीदें
जिंदा रखी थी
आप भी कभी रुकिएगा तो उन मासूमों को समझिएगा
क्योंकि एक रुकना,
किसी के लिए पूरी दुनिया बन सकता है !!
राकेश उप्रेती
उत्तराखण्ड

