
पहचान……..

खाली होते गांव
मेरे पहाड़ के
ताले लगे बंद द्वार
पाखे में जमीं घास वाले मकान।
अर्याटी कर्याटी में
उगा सिसौण का भूड़
बंजर होते खेत
बता रहे हैं उरातार हो रहे
पहाड़ से पलायन की दास्तान।
जो जहां गए वहीं रम गए
पीढ़ियां बीत गईं
पुश्त बीत गए
बना ली वहीं अपनी पहचान।
भूल गए पहाड़ीपन
और खूबसूरत पहाड़ को
भूल गए रीति रिवाज परंपराओं को
भाषा बोली तीज त्योहार
पुरखों की थात उनका लोक विज्ञान।
नहीं आती यादें अब
ज़िंदगी की आपाधापी में
क्या याद करें पहाड़ में पहाड़ सी जिंदगी को
किसका मानें बरजें अहसान।
क्या दिया उन्हें पहाड़ के नियंताओं ने
सिवाय बेरोजगारी के
बदहाल स्कूल और अस्पतालों के
मुफ्तखोरी कामचोरी
यही तो बना दी पहाड़ की पहचान।
हरा गई खेती
बिखर गया पशुपालन
ढह गए गुजर बसर के अनुषंगी उपक्रम
बागवानी का नहीं कोई इंतजाम।
विस्तीर्ण वोटों की राजनीति
संपुट थामे करोड़ों हाथ
क्या करें सब मजबूर
पहाड़ और अपनों से दूर
बस मजबूर इंसान पहाड़ की पहचान।
रतनसिंह किरमोलिया


