आइए कुर्मांचल अखबार के साथ पढ़ते हैं वन्यजीवों पर लिखी कृपाल सिंह शीला की स्वरचित कविता

वन्य जीवन

वन्य जीव और वनस्पतियों से,
सदा जैव विविधता होती समृद्ध।
सभी जीव विचित्र, महत्त्वपूर्ण है,
शेर,हाथी,हिरन,साँप या हों गिद्ध।

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इन सभी जीवों से संतुलित रहता,
खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल ।
इन वन्य जीवों को कभी न छेड़ें,
इन्हें रहने दो इनके सूरतेहाल।।

जब से जंगलों के भीतर हमने,
रिजॉट बना छीना इनका आवास।
वन्यजीव गाँवों को रुख कर गये,
और आ गये हमारे घरों के पास।।

ये जीव ही हैं जो प्रकृति में,
नित बनाये रखते संतुलन।
ये करते बीजों का प्रकीर्णन,
उगे पौधों से भरे रहते वन ।।

चिड़िया कीटों को खाकर,
फसलों की पैदावार बढ़ाते।
गिद्ध मृत जीवों को खाकर,
नित पर्यावरण को शुद्ध बनाते।।

शाकाहारी पत्तियों को खाते,
मासांहारी करते शाकाहार।
जन्तु निर्भर वनस्पतियों पर,
वन हम सबके जीवनाधार ।।

हरी पत्तियाँ बकरी खाये ,
बकरी को खाये बाघ।
कीट पत्तों को, कीट को मेंढक,
मेंढक को साँप,साँप खाये बाज।।

ऐसे खाद्य श्रृंखला चलती,
प्रकृति का बनता संतुलन।
सभी जीव-जन्तु महत्त्वपूर्ण हैं,
संरक्षित करना सबका जीवन ।।
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कृपाल सिंह शीला (स.अ.-विज्ञान)
रा.जू.हा.- मुनियाचौरा, क्षेत्र – भिकियासैंण (अल्मोड़ा), उत्तराखंड।
मो./हृवटसैप – 9410501464

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