आइए कुर्मांचल अखबार के साथ पढ़ते हैं राकेश उप्रेती की स्वरचित कविता ” माँ की ममता की जीत “

” माँ की ममता की जीत “

 दिनांक 30 अप्रैल 2026

बरगी डैम जबलपुर (मध्यप्रदेश) का दिल दहलाने वाला हादसा

अखबार में छपी एक तस्वीर थी
माँ की गोद में बच्चा , और दोनों खामोश थे
लोगों ने कहा हादसा था
मैंने कहा माँ की ममता की जीत थी
रोज की तरह ही था ना मेरा आज भी
सूरज निकला था चिड़ियाँ चहकी थी
मेरा बच्चा मेरी गोद में हँसा था
ये सब कुछ समय का था
फिर अचानक बिल्कुल ऐसा जो मेरा सब कुछ ख़त्म सा कर गया

क्या कसूर था मेरा हे ईश्वर ?
जो मेरे साथ मेरे दिल के टुकड़े को भी साथ में छिन लिया
वो दिल का टुकड़ा जिसे मैंने तुमसे ही तो माँगा था
9 महीने अपने गर्भ में संभाला था
एक माँ होने के नाते पूछती हूँ मैं
ऐसा क्यों हुआ ये हादसा ?
लोग कहते है पानी का दवाब टनों में था
मैं कहती हूँ माँ का कलेजा पहाड़ों से भारी था
तुम ही बताओ जीता कौन ?

वो पानी जो बह गया था वो ममता जो ठहर गई मेरी
मैं जो एक माँ थी इन सब से लड़ती रही अंतिम समय तक
खुद से ज्यादा अपने दिल के टुकड़े के लिए
लहरें जो ज़ालिम थी मुझे खींच रही थी
पर मेरी बाँहे लोहे सी अकड़ गई थी
मैं बहुत चीखी पुकारा पर कोई सुन न सका
मैं डूबी तो अपने बच्चे को सीने से चिपका के डूबी
सारी कोशिशों के बाद भी जब में कुछ कर न सकी
तो मैंने अपने बच्चे को अपने आँचल से छिपाकर
अपने गले से लगा लिया
मैंने अपनी अंतिम साँस तक अपने बच्चे को पकड़े रखा
जब पानी से हमें निकाला गया
तो मेरे सीने से मेरा बच्चा और मेरी मुट्ठी में उसके नन्हें हाथो की लकीरे थी
मौत ने शरीर छीना होगा
पर स्पर्श नहीं छीन पाई
लोग कहते है माँ भगवान का रूप होती है
आज मैंने देख लिया भगवान भी माँ के आगे झुक जाता है
आज ये बरगी डैम भी ये मान गया
मेरी इस ममता के आगे आज से मौत भी हार गई
एक माँ की ममता आज फिर जीत गई !!

राकेश उप्रेती
अल्मोड़ा उत्तराखण्ड ✍️

Leave a Reply