आइए कुर्मांचल अखबार के साथ पढ़ते हैं रतन सिंह किरमोलिया की स्वरचित कविता “मां चली गई चुपचाप”

मां चली गई चुपचाप

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मां!
कर्म की मूरत
मर्म की सूरत
घर गोठ से खेत
और दूर जंगल तक
अल सुबह से देर रात तक
प्रतिबद्ध जुटने खपने
हंस हंस कर तिल तिल मिटने को
जंगल पेड़ धुर धार गधेरे
वो पार की ऊंची धार
वो कल कल छल छल बहती नदी
गैले पातल नौले धारे
उसके जीवन की सांसें
उसके जीने की ऊर्जा
जी नहीं सकती वह इनके बिना
घर परिवार की बलिबेदी पर
न्यौछावर उसका सब कुछ
बहू बेटे हुए
अब आराम के दिन आए ही थे
मां चल दी छोड़ अपने पदचाप
नहीं था आराम शायद उसकी किस्मत में
इसीलिए वह चली गई
गोठ खेत नौले धारे नदी
गैले पातल जंगल गधेरे
सब कुछ छोड़ कर चुपचाप।


**रतनसिंह किरमोलिया


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