आइए कुर्मांचल अखबार के साथ पढ़ते हैं रतनसिंह किरमोलिया की स्वरचित कविता “बाहर धूप आ गई है”

बाहर धूप आ गई है

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अल सुबह,
बाहर इस्कूली बच्चों का शोर
उनमें आधे लड़के और आधी लड़कियां थी
उनका अंडबंड शोर हो रहा था
हवा को भी झकझोर रहा था
मैं बिस्तर पर लेटा लेटा शर्मिंदा हुआ जा रहा था
मन ही मन सोचता जा रहा था
कहीं जागी हुई मां बहन न सुन लें
कुछ के मोबाइल पर तेज आवाज में
भद्दे भद्दे गाने बज रहे थे
ये बच्चे ट्यूशन पढ़ने जा रहे थे
मेरा रास्ते का मकान था
मैं बिस्तर पर लेटा
चिंता और चिंतन की मुद्रा में था
घर में मां-बाप और इस्कूल
इन्हें क्या सिखाते होंगे
घर में भी क्या ये ऐसा ही करते होंगे
घर से ज्यादा समाज से सीखते हैं
समाज के प्रभाव ज्यादा दिखते हैं ,
बड़बाज्यू कहा करते थे
संस्कार घर से अंकुरित होते हैं
स्कूलों में पल्लवित होते हैं
और समाज में पुष्पित होते हैं
तब मूल्यवान बनता है यह जीवन
और सरस्वती का वरदान मिलता है
सरस्वती संस्कार और मूल्य देती है
अब इस्कूलों में सरस्वती नहीं लक्ष्मी बोलती है
लक्ष्मी संस्कार और मूल्य देती नहीं छीनती है
बड़बाज्यू अक्सर कहा करते थे –
कमबख़्त नंगा समय आ रहा है
सचमुच मुझे भी लगा
परंतु बखत कमबख़्त और नंगा नहीं होता
कमबख़्त और नंगे हम हुए जा रहे हैं
भोग लिप्सा स्वार्थ के कारण नंगई बढ़ रही है
मानवता भी क्या रूप पा रही है
मैं यह सोचते हुए उठ गया
कि यह भोग-विलास वादी प्रवृत्ति
कब खतम होगी और
मनुष्य मनुष्य कब बनेगा
बाहर धूप आ गई है।


** रतनसिंह किरमोलिया

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