
करगिल विजय…

बात रखी थी ‘अटल’ नई पहल नये दौर की
शान्तिदूत बन बस यात्रा की थी लाहौर की !
सब बदल सकते नही बदल सकते पड़ोसी
थोड़ा हम चलें पास आओ तुम भी थोड़ीसी !
यूं आपस में नही हमें तो लड़ना है गरीबी से
सुलझानी है हर मुश्किल बैठ कर करीबी से !
अभी लाहौर मसौदे की स्याही नही सूखी थी
विश्वासघात करने बैठी पाकी सेना भूखी थी !
कायरो ! करगिल में पीठ में खंजर घोप दिया
शान्ति प्रिय देश के ऊपर था युद्ध थोप दिया !
चला आप्रेशन ‘विजय’ लिखने नई विजयगाथा
कुर्बानी वीरो ने किया माँ का ऊचा माथा !
फिर क्या था जाबॉज जवान हमारे आये काम
दुश्मन को रौदा, खदेड़ा और किया काम तमाम !
सौरभ कालिया, योगेंद्र, विक्रम बत्रा व नचिकेता
अनेकों शूरवीर, बलिदानी बनते चले विजेता !
दुर्गम, जटिल ऊचॉ रणभूमि बना था करगिल
जहाॅ लुके-छुपे थे मुशरर्फ के मूसे बनाये
बिल !
द्रास, बटालिक,तोतोलिंग,मश्कोह व छोटे हिल
ताजुब्ब लोमड़ीयो के कब्जे में भी टाईगरहिल !
तोड़ टाईगरहिल गोलों से लोमड़ीयों को भगाया
तब इंडियन टाईगरों ने अपना तिरंगा फहराया !
भारी बर्बादी, बड़े युद्ध से डर नवाज घबराया
अब बचा लो अंकल सैम वह कह मिमियाया !
धिक्कारते तुम्हारे ही लोग तुम्हें पाकी बुजदिलों
कम से तुम अपने जवानों की लाशें तो उठालो !
औकात क्या हैं तुम्हारी, दहशत के रहनुमाओं
अपनी भूखी-प्यासी अवाम पे तो तरस खाओं !
फिर जुर्रत की तो दुनिया के नक्शे से मिट जाओगें
कटोरे से भीख माँगने वालों तुम क्या लड़ पाओगे !
आज ” करगिल विजय दिवस ” के उपलक्ष में हमारे वीर सैनिकों के अदम्य साहस, पराक्रम, वीरता, बहादुरी और सर्वोच्च बलिदान के लिए
मैं अपनी इस कविता को उनके सम्मान में सादर
समर्पित करता हूं |
जयहिन्द !!
जीवन सिंह
पुणे महाराष्ट्र

