चिपको आंदोलन वर्षगांठ विशेष -: जंगलों को बचाने के लिए किया गया एक अनूठा संघर्ष, महिलाओं की अहम भूमिका

26 मार्च 1973 को चमोली के रैणी गांव में चिपको आंदोलन शुरू हुआ था| जिसमें महिलाएं पेड़ों पर चिपक गई थी| आज के दिन को भले हम कैसे भूल सकते हैं आज से 50 वर्ष पहले चमोली जिले के रैणी गांव में वनों को काटने से बचाने के लिए एक ऐसे आंदोलन ने जन्म लिया जो राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर गया| गांव की गौरा देवी की अगुवाई में ग्रामीण महिलाओं ने पेड़ों पर चिपक कर उन पेड़ों को बचाया और पर्यावरण संरक्षण का अनोखा मंत्र दिया| जिसके बाद पूरी दुनिया महिलाओं के इस आंदोलन को चिपको आंदोलन के नाम से जानने लगी| यह आंदोलन पर्यावरण रक्षा का आंदोलन था| भारत के उत्तराखंड राज्य (तब उत्तर प्रदेश का भाग) में किसानों ने वृक्षों की कटाई का विरोध करने के लिए किया| यह सभी राज्य के वन विभाग के ठेकेदारों द्वारा वनों की कटाई का विरोध कर रहे थे और उन पर अपना परंपरागत अधिकार जता रहे ठेकेदारों को रोकने के लिए पेड़ों पर चिपक गए थे| यह उत्तराखंड के चमोली जिले में 1973 में प्रारंभ हुआ एक दशक के अंदर यह पूरे उत्तराखंड क्षेत्र में फैल गया| इस आंदोलन में स्त्रियों की एक अहम भूमिका थी और स्त्रियों ने इस में बढ़ चढ़कर भाग लिया| इस आंदोलन की शुरुआत 1973 में भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा, कामरेड गोविंद सिंह रावत, चंडीप्रसाद भट्ट तथा गौरा देवी के नेतृत्व में हुई थी| इस आंदोलन की मुख्य उपलब्धि यह रही कि इसमें केंद्रीय राजनीति के एजेंडे में पर्यावरण को एक सघन मुद्दा बना दिया| चिपको के सहभागी तथा कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर डॉ शेखर पाठक के अनुसार ‘भारत में 1980 का वन संरक्षण अधिनियम और यहां तक कि केंद्र सरकार में पर्यावरण मंत्रालय का गठन भी चिपको की वजह से ही संभव हो पाया|’ वर्तमान उत्तराखंड में इस आंदोलन ने 1980 में तब एक बड़ी जीत हासिल की जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने प्रदेश के हिमालय वनों में वृक्षों की कटाई पर 15 वर्षों के लिए रोक लगा दी| बाद के वर्षों में यह आंदोलन पूर्व में बिहार, पश्चिम में राजस्थान, उत्तर में हिमाचल प्रदेश, दक्षिण में कर्नाटक और मध्य भारत में विंध्य तक फैल गया था| उत्तर प्रदेश में प्रतिबद्ध के अलावा यह आंदोलन पश्चिमी घाट और विंध्य पर्वतमाला में वृक्षों की कटाई को रोकने में सफल रहा| साथ ही यह लोगों की आवश्यकताओं और पर्यावरण के प्रति अधिक सचेत प्राकृतिक संसाधन नीति के लिए दबाव बनाने में भी सफल रहा|