
सामाजिक कार्यकर्ता संजय पाण्डे ने मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य सचिव और स्वास्थ्य महानिदेशक को लिखा पत्र, प्रदेश की चरमराई स्वास्थ्य व्यवस्था को बचाने की मांग की।
उत्तराखंड में चारधाम यात्रा हर साल लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहती है। लेकिन इसके लिए की जाने वाली चिकित्सा व्यवस्थाओं की आड़ में प्रदेश की पहले से ही संकटग्रस्त स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी दबाव डाला जा रहा है। चारधाम यात्रा मार्ग पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए सरकार पर्वतीय जिलों के डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को तैनात कर देती है, जिससे पहाड़ी इलाकों में मरीजों को इलाज तक नहीं मिल पाता। क्या यह फैसला तर्कसंगत है? क्या तीर्थयात्रियों की चिकित्सा सुविधा के नाम पर पहाड़ के लोगों को उनके हाल पर छोड़ देना उचित है?
पहाड़ों में पहले से चरमराई हुई स्वास्थ्य सेवाएं
उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों—अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत, उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग में स्वास्थ्य सुविधाएं पहले ही संकट में हैं। यहां न्यूरोसर्जन, कार्डियोलॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट, एनेस्थेटिस्ट और अन्य विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है। कई अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं, जैसे सिटी स्कैन, एमआरआई और लेप्रोस्कोपिक सर्जरी हाल ही में उपलब्ध कराई गई हैं या अब भी अधूरी हैं।
ऐसे में जब इन अस्पतालों के डॉक्टरों और स्टाफ को चारधाम यात्रा में भेजा जाता है, तो स्थानीय मरीजों के लिए संकट और गहरा हो जाता है। गर्भवती महिलाओं, गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों और आकस्मिक दुर्घटनाओं के शिकार लोगों के लिए यह स्थिति बेहद खतरनाक हो जाती है।
सामाजिक कार्यकर्ता संजय पाण्डे ने उठाई आवाज
इस गंभीर मुद्दे को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता संजय पाण्डे ने मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य सचिव और स्वास्थ्य महानिदेशक, चिकित्सा एवं परिवार कल्याण को पत्र लिखकर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने मांग की है कि चारधाम यात्रा के लिए स्थानीय डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की तैनाती करने के बजाय बाहरी राज्यों से अस्थायी मेडिकल स्टाफ की व्यवस्था की जाए, ताकि पहाड़ों में रहने वाले लोगों को बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं से वंचित न होना पड़े।
क्या हैं संभावित समाधान?
संजय पाण्डे ने सरकार को कुछ ठोस सुझाव दिए हैं:
चारधाम यात्रा के लिए विशेष मेडिकल टीमों का गठन किया जाए, जिसमें बाहरी राज्यों से डॉक्टरों की प्रतिनियुक्ति की जाए।
टेलीमेडिसिन और मोबाइल मेडिकल यूनिट्स की संख्या बढ़ाई जाए, ताकि यात्रियों को वहीं चिकित्सा सुविधा मिल सके और स्थानीय अस्पताल प्रभावित न हों।
सेवानिवृत्त डॉक्टरों और निजी अस्पतालों की सेवाएं ली जाएं, जिससे अतिरिक्त मेडिकल स्टाफ उपलब्ध हो सके।
चारधाम यात्रा में कार्यरत मेडिकल टीम को यात्रा समाप्त होने के बाद वापस भेजने की व्यवस्था हो, जिससे स्थानीय अस्पतालों की स्थायी चिकित्सा सेवाएं बाधित न हों।
सरकार कब लेगी ठोस फैसला?
चारधाम यात्रा निश्चित रूप से उत्तराखंड की संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि प्रदेश के स्थायी निवासियों की स्वास्थ्य सुविधाओं की बलि चढ़ा दी जाए। यदि सरकार इस विषय पर गंभीर नहीं होती है, तो यह समस्या हर साल बढ़ती जाएगी और पर्वतीय जिलों के मरीजों को बुनियादी इलाज से वंचित रहना पड़ेगा।
सामाजिक कार्यकर्ता संजय पाण्डे ने सरकार से मांग की है कि तत्काल इस पर ठोस नीति बनाई जाए, जिससे चारधाम यात्रा की चिकित्सा व्यवस्था मजबूत हो, लेकिन स्थानीय अस्पतालों को स्टाफ की कमी से जूझना न पड़े। अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार इस मुद्दे पर क्या कदम उठाती है – क्या चारधाम यात्रा के नाम पर हर साल पहाड़ी अस्पतालों से स्टाफ की कमी होती रहेगी, या इस समस्या का कोई स्थायी समाधान निकलेगा?
