Uttarakhand:- 750 साल पुराने बालेश्वर मंदिर को फिर से सहेजने की कोशिश….. इस तकनीक का किया जा रहा है प्रयोग

13वीं शताब्दी में स्थापित बालेश्वर मंदिर जो कि स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है उसे फिर से रासायनिक उपचार दिया जा रहा है। बता दे कि मंदिर को एक बार फिर से सहेजने की कोशिश की जा रही है। बालेश्वर मंदिर खजुराहो शैली को भी खुद में समेटे हुए हैं और यह ऐतिहासिक तथा धार्मिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है तथा बालेश्वर मंदिर समूह पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के संरक्षण में है। विभाग की देखरेख में मंदिर का रासायनिक उपचार शुरू कर दिया गया है और इससे प्राचीन धरोहर के वास्तविक स्वरूप को बनाए रखने में भी मदद मिलेगी। बता दें कि बालेश्वर मंदिर चंद शासको द्वारा स्थापित किया गया था और यह रासायनिक उपचार पर टिका हुआ है। पुरातात्विक महत्व वाले सदियों पुराने मंदिर को संरक्षित करने के लिए समय-समय पर परीक्षण व जीर्णोद्धार का कार्य किया जाता है तथा एक बार फिर मंदिर के बाहरी व भीतरी हिस्से में शिलाओ का रासायनिक उपचार कर उन्हें सहेजने का कार्य किया जा रहा है। मंदिर की स्थापना 1272 ईसवी में हुई थी और मंदिर समूह को एक के ऊपर एक रखने में बेहतरीन इंजीनियरिंग की मिसाल कायम की गई है और कुछ इस तरह से विशालकाय शिलाओं को आपस में जोड़ा गया है जिससे यह मंदिर अभी तक स्थिर है। मंदिर ने 1742 में रूहेलो का आक्रमण भी झेला है।तब की खंडित हुई मूर्तियों को मंदिर परिसर में सहेजा गया है और यह मंदिर शिल्प कला की दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है। यहां भगवान शिव के अलावा मां भगवती, चंपा देवी ,भैरव ,गणेश और मां काली की मूर्तियां भी है।