
छ: ऋतुनैकि बहारनानानान् दिन लागनी ,खबीसन जस अन्यार पड़ि रौछ,
ग्यों मसुर में दाण् ऐ गईं, आरु खुमानि में फूल ऐ रौछ।
सम्यो गुलबनफ्स देखीण भैटि गई प्योलि फुलि बहार है रैछ,
घाक् बहानल फसक मारणईं बसंत ऋतु में यो भरमार है रैछ!!
मनतात मनतात दिन ऐ गईं, धाम देखि बेर खार लागणै,
स्योव भैटणा धैं बोट चाणइं ,धुपरि में दाव भात पाकणै।
न्यूत पौतन में जानै-जानै , हिटन-हिटनै पटै लागि रैछ,
पसिणाक् नाव् फुटि रइं ,लागणौ ग्रीष्म ऋतु ऐ रैछ!!
छतुर टोपिल भ्यार ऐ गईं,धान मडु में हुड़कि बौल लागं,
कच्यार में हाथ खुट सानिनी , सुकि नौव लै चौल लागं।
कस हर्यावौक त्यार उणौ,जन्योपुन्यू जन्माष्टमि ऐ जैंछ,
डोर दुबाड़ाक दिन लै उनी,मल्हार में बर्षा ऋतु छै रैछ!!
झूंगर कौणि पौषण लाग गईं, धान में ले बालाड़ ऐ गई,
पेट भरी जां मन नि भरीन , लगुलन में काकाड़ है रइं।
क्वे मानणै क्वे छिटणै क्वे फड्याव लगूनै पटै रैईं,
गौंनु-गोनूं में रामलीला है रैछ,लागणौ शरद ऋतु ऐ रैछ।।
बजारन में झिलमिलाट देखीं,लछिम गणेश कि पुज हुणै,
खिल बतासाक थुपुड़ लागि रईं, शहरैकि रौनक घर उणै।,
डानकानन में ह्यूं पड़ि गोछ,रत्तै-ब्याल खूब जाड़ है रौछ ,
गौहतैकि दाल मडुवाक् र्वाट पाकनी, हेमंतक जोर है रौछ!!
बादल देखि बेर थुरुड़ि कांपणै,कड़कताइल कल्ज डरणौ,
खाताड़- माताड़ चैन पड़ि गईं,आग् तापण हूं मन करणौ।
टान मानन बै हाड़खुन चानी, क्याड़- म्याड़ सब्बै फुकिगै, आण-काथ करणी दिन ऐ रईं, तब लागं शिशिर ऋतु ऐगे!!
प्रकाश पाण्डेय
कनखल (हरिद्वार)

