
अभी तक जोशीमठ में भू-धंसाव क्यों हो रहा है इसका कोई ठोस कारण सामने नहीं आया है|
वैज्ञानिकों को मोर्चे पर लगाया गया है, लेकिन प्रश्न यही है कि पिछले 47 सालों में जो रिपोर्ट आई उन पर कितना अमल हुआ|
इस अवधि में 5 बार इस क्षेत्र का वैज्ञानिकों की संयुक्त टीम ने सर्वे किया| लेकिन वैज्ञानिकों की संस्तुतियां सरकारी फाइलों से बाहर नहीं निकल पाई| हर बार वैज्ञानिकों ने जोशीमठ पर मंडराते खतरे को लेकर चेतावनी दी| लेकिन इसके बाद जियो टेक्निकल व जियोफिजिकल अध्ययन कराने की ओर से आंखें फेर ली गई| जिस कारण उपचारात्मक कार्य नहीं हो पाए और आज स्थिति सबके सामने है|
बताते चलें कि पुराने भूस्खलन क्षेत्र में बसे जोशीमठ में पूर्व में अलकनंदा नदी की बाढ़ से भू कटाव हुआ था, साथ ही घरों में दरारें भी पड़ी थी| इसे देखते हुए वर्ष 1976 में तत्कालीन गढ़वाल मंडल आयुक्त महेश चंद्र मिश्रा की अध्यक्षता में वैज्ञानिकों की कमेटी गठित हुई| जिसमें 18 सदस्य थे| जिसने क्षेत्र का गहन अध्ययन कर जोशीमठ शहर पर मंडराते खतरे को लेकर सचेत किया साथ ही वहां पानी की निकासी की पुख्ता व्यवस्था करने समेत अन्य कई कदम उठाने की संस्तुतियां की|
इसके बाद वर्ष 2006 में डॉ सविता की अध्यक्षता में रिपोर्ट, वर्ष 2013 की जल प्रलय के बाद उत्पन्न स्थिति की रिपोर्ट और वर्ष 2022 में विशेषज्ञों की टीम की रिपोर्ट में जोशीमठ पर मंडराते खतरे का उल्लेख हुआ| साथ ही ड्रेनेज सिस्टम, निर्माण कार्यों पर नियंत्रण समेत अन्य कदम उठाने की संस्तुतियां की, लेकिन 1976 से लेकर 2022 तक 4 रिपोर्ट आने के बावजूद भी संस्तुतियों के आलोक में जोशीमठ क्षेत्र का भूगर्भीय सर्वेक्षण भूमि की पकड़, धारण क्षमता, पानी के रिसाव के कारण समेत अन्य बिंदुओं के दृष्टिगत जिओ टेक्निकल, जियोफिजिकल, हाइड्रोलॉजिकल जैसे अध्ययन कराने की जरूरत नहीं समझी गई|
अब हाल यह है कि जोशीमठ में पानी सिर से ऊपर बहने लगा है| तो वैज्ञानिकों की टीम ने दोबारा सर्वेक्षण कर अपनी रिपोर्ट शासन को सौंपी है जिसमें सुझाए गए बिंदुओं के आधार पर सरकार ने कदम उठाने शुरू कर दिए हैं|
वैज्ञानिकों ने इन कारणों को माना आपदा का प्रमुख कारण -:
पुरानी भूस्खलन क्षेत्र में मलबे के ढेर पर बसा होना|
ड्रेनेज की व्यवस्था न होने के कारण जमीन के भीतर पानी का रिसाव|
अलकनंदा नदी से हो रहे कटाव की रोकथाम के लिए कदम न उठाना|
शहर व आसपास के क्षेत्रों में नालों का चैनलाइजेशन व सुदृढ़ीकरण न होना|
धारण क्षमता के अनुरूप निर्माण कार्यों को नियंत्रित न किया जाना|
वैज्ञानिकों के सुझाव पर अमल न करना|

