
“चार दिन की दिवाली”

कितना अजीब है ना, त्यौहार करीब है,
सबको घर जाने की खुशी है,
किसी ने टिकट करा ली है,
किसी ने सामान पैक कर लिया है..
महीनों बाद घर जाने की वो खुशी,
बेहद अलग सी होती है ना?
माँ के हाथ का खाना, पिता के साथ चाय,
यही छोटी छोटी खुशियाँ शायद सबसे बड़ी होती हैं..
पर बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं,
जो इस बार घर नहीं जा पाएँगे,
किसी की ड्यूटी होगी, किसी के पास पैसे नहीं होंगे,
तो कोई घर पर होकर भी दिवाली नहीं मना पाएगा..
और जो घर आ गए हैं,
चार दिन बाद उन्हें फिर जाना होगा,
उसी परदेश, जहाँ वो अपनों को खुश रखने के लिए
रोज़ नौकरी करते हैं, पैसे कमाते हैं..
जाते वक्त माँ दरवाज़े तक आएगी,
कहेगी, “बेटा फोन करते रहना, अपना ख्याल रखना”
पिता कुछ कहेंगे नहीं,
पर उनकी आँखों में भी आँसू होंगे,
और शायद बेटे की आँखों में भी..
क्योंकि ये बिछड़ना सबसे दुखद होता है,
जिस घर के लिए महीनों इंतज़ार किया,
उसी घर को चार दिन में छोड़कर जाना पड़ता है।
और जाते-जाते वो यही सोचेगा,
काश ये त्यौहार कभी खत्म ही ना होते,
काश ये चार दिन यहीं रुक जाते…
राकेश उप्रेती
अल्मोड़ा उत्तराखण्ड
93896 65318


