आइए कुर्मांचल अखबार के साथ पढ़ते हैं उत्तराखंड के अनूठे लोक पर्व “खतडुवा” पर लिखा लेख

उत्तराखंड के ज्यादातर लोकपर्व कृषि व पशुधन से जुड़े हैं। यह पर्व भी पशुधन की समृद्धि और खेतों में हरियाली, फसलों से लहलहाते खेत , फसल के पकने व नई ऋतु के आगमन का प्रतीक हैं। इस दिन से जाड़े के मौसम की शुरुआत हो जाती है।लोकमान्यता के अनुसार इस दिन से एक खातड़ (रजाई) ढ़कने की आवश्यकता के बराबर जाड़ा हो जाता है। तभी इस दिन को खतडुवा पर्व से संबोधित किया जाता है। आज के दिन से हिन्दू माह के असोज का एक गते (01 पैट) यानि असोज माह का पहला दिन होता है। इस माह में हम दोनों फसलों (बारहनाजा) की उपज खरीफ व जायद की फसल को प्राप्त करते हैं। इसी माह के अन्त में रबी की अघेती फसल को सिर्फ एक क्षेत्र में बोया जाता है। एक क्षेत्र को 5-6 माह के लिए खाली छोड़ दिया जाता है। उत्तराखंड का ज्यादातर भू – भाग पर्वतीय व असिंचित होने से इस असोज के माह में किसान लोग अच्छी फसल लेते हैं। क्योंकि यह फसल बरसात के मौसम में तैयार होती है। इस मौसम में धान, मक्का, मिर्च,भट्ट ,गहत उड़द, मडुवा, झंगोरा,तिल, भंगीरा, कौणी,ककड़ी ,कद्दू, लौकी,तोरई, करेला, चिचण्ड़ा, भिंडी,अरबी, सेम,बैगन आदि की फसल ली जाती है। यह एक कृषि व पशुधन का पर्व है। इस असोज के माह में पशुओं के लिए 6 माह के लिए घास काटकर उसे सुखाकर लुट्टे लगाकर संग्रहित कर लिया जाता है। यह पर्व लोकमान्यता से भी जुडा़ है। पुराने लोग बताते हैं कि खतडुवा एक राजा था। जिसने गायों के साथ क्रूरता की। गाँव घरों में आज के दिन लोग सूखी घास को इकट्ठा कर जलाते हैं। सभी पारिवारिक जन जलती आग में कूद मारकर आर – पार करते हैं। और ककड़ी के छोटे – छोटे टुकड़ों को अग्नि में प्रवेशित कर कुमाउनी भाषा में “गाय की जीत, खतडुवा की हार, खतडुवा न्है गो धारो – धार”जोर से बोलते हैं। यानि गाय की जीत हुई है, राजा खतडुवा की हार हुई है। यह पर्व आज भी विशुद्ध रुप से गाँवों में मनाया जाता है। और यह पारंपरिक, पौराणिक संस्कृति, पर्व आज भी जिंदा है। गाँव – सरपटा, पो. – बासोट, ब्लॉक, तहसील – भिकियासैंण (अल्मोड़ा), उत्तराखंड से कृपाल सिंह शीला (स.अ. विज्ञान ) द्वारा ग्राउंड जीरो से यह संक्षिप्त रिपोर्ट तैयार की गयी है। हम सभी को उत्तराखंड के लोक पर्व व कृषि पर्वों को संरक्षण प्रदान किये जाने के साथ ही आने वाली नई पीढ़ी को इन परंपराओं, पर्वों को हस्तांतरित किये जाने की आवश्यकता है। जिससे नई पीढ़ी भी अपनी साहित्य – संस्कृति, रीति- रिवाज, परंपराओं, मान्यताओं, लोक पर्वों, कृषि पर्वों, मेलों से परिचित हो सकें।

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कृपाल सिंह शीला….

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