
उत्तराखंड राज्य में अब बच्चे लोक भाषा में पढ़ाई कर पाएंगे। बता दे कि गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनेंगे।इस मामले में स्टेट काउंसिल आफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग ने पाठ्यचर्या तैयार कर ली है। प्रथम चरण में गढ़वाली,कुमाऊनी और जौनसारी लोक भाषा से संबंधित पाठ्य पुस्तक तैयार की जा रही है।
जिसके बाद अन्य लोक भाषाओं में भी पुस्तक तैयार की जाएगी। बता दे कि उत्तराखंड की लोक भाषा यहां की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है और बच्चों को अब अपनी लोक भाषा में किताबी ज्ञान प्राप्त हो पाएगा। एनसीईआरटी के अपर निदेशक अजय कुमार नौटियाल का कहना है कि लोक भाषाओं में पाठ्यपुस्तक के शामिल करने से बच्चों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का अवसर मिलेगा इससे छात्र-छात्राओं में प्रतिभा विकसित होगी तथा विलुप्त होती लोक भाषा को भी काफी बढ़ावा मिलेग तथा बच्चों में सांस्कृतिक संवेदनशीलता का विकास भी होगा और मातृभाषा में विचारों को व्यक्त करने की स्पष्टता आएगी। जानकारी के मुताबिक लोक भाषा आधारित पुस्तकों को लिखने के लिए गढ़वाली भाषा में विशेषज्ञ के रूप में डॉक्टर उमेश चमोला, कुमाऊनी के लिए डॉक्टर दीपक मेहता और जौनसारी के लिए सुरेंद्र आर्यन अपना योगदान दे रहे हैं।

